Elephanta Caves One Day Trip
Elephanta Caves One Day Trip

मुंबई से एलिफेंटा केव्स: One Day Trip की पूरी गाइड

मुंबई आए और मुंबई के आसपास की जगहें नहीं गए तो ये तो एक घुमक्कड़ के रूप में ये तो ना इंसाफी ही होगी इसी सोच के साथ मैं मुंबई ट्रिप में निकल गया एलिफेंटा केव्स जिसने मेरा ये ट्रिप यादगार बना दिया। इसके लिए मैं सुबह सुबह गेटवे ऑफ इंडिया पहुंचा जहां अलग-अलग फेरी की टिकट के काउंटर लगे थे। यहीं से एलिफेंटा केव्स की फेरी की टिकट लेकर मैं अपना ये सफर शुरु किया। आज की फेरी नॉर्मल थी, चारों ओर से खुली हुई जहां हवा और पानी इतनी तेजी से आ रहा था कि क्या ही बताऊं। जैसे ही फेरी चलनी शुरु हुई मैंने किनारे की सीट ले ली की समुद्र को अच्छे से निहारने का मौका मिलेगा। लेकिन ये मेरे लिए सज़ा बन जाएगा ये मुझे नहीं पता था जैसे ही तेज़ लहरें फेरी से टकराती तो पानी पूरे तेजी उछलकर मेरे उपर आ रहा था। साथ ही मेरे जैसे ही नये लोग ही साइड में बैठ रहे थे बाकि जो लोकल लोग थे वो बीच में बैठ कर आराम से मुस्कुरा रहे थे जैसे कह रहे हो ‘नया लड़का है, सीख जाएगा’। करीबन 40 मिनट के बाद समुद्री हवा और पानी के छिड़काव के बीच मैं एलिफेंटा आइलैंड पहुंच गया।

फेरी से उतरने के बाद करीबन डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई शुरुआत होती है लेकिन यहां टॉय ट्रेन भी चलती है और टॉय ट्रेन का अनुभव मेरे लिए बिल्कुल नया था तो मैंने टॉय ट्रेन ही ली जिसका किराया 15 रुपये का था और 5-10 मिनट में ऊपर पहुंचा दिया। इसके आगे 120 सीढ़ियां चढ़कर ही ऊपर जाने का एक मात्र रास्ता था। जो व्यक्ति चढ़ना नहीं चाहते उनके लिए पालकी की सुविधा भी है। जैसे जैसे ऊपर चढ़ रहे थे वैसे वैसे दोनों ओर दुकानें ध्यान अपनी ओऱ खींच रही थी। जहां शंख, समुद्री पत्थर, टेराकोटा, हाथ से बनी चीज़ें थी। जैसे ऊपर बढ़ रहा था वैसे ही मन खुशी बढ़ती जा रही थी कि कैसा होगा अंदर। कितना भव्य होगा जिसे किताबों में ही पढ़ा है अभी तक। ऊपर पहुंचने के बाद सबसे पहले 30 रूपये की एंट्री टिकट ली और आगे बढ़ा।

जैसे ही मुख्य गुफा के बाहर पहुंचा तो मैं थोड़ा निराश हुआ क्योंकि ये दूर से एक खंडहर जैसा लग रहा था। मन ही मन सोचा अगर से मुख्य गुफा ही ऐसी है तो बाकि कैसी ही होगी। लेकिन अंग्रेजी में कहावत है ना कि ‘डोंट जज अ बुक बाय इट्स कवर’ ये बात इस गुफा पर बिल्कुल सही साबित होती है। जैसे ही मैं अंदर गया तो सच में पलकें झपकाना भूल गया। जितना मैं देख रहा था समझ रहा था उतना ही दिमाग मानों काम करना बंद रहा था। इसी कारण से इसे सकी खुबसूरती और बनावट के कारण यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है एक पहाड़ को काटकर इतनी बड़ी बड़ी मुर्तिया बनाना, 36 खंभे बनाना और मुर्तियों में बारीक नक्काशी देखकर लग रहा था कि कैसे कर दिया होगा ये सब। कितने समय में किया होगा, आइडिया कैसे आया होगा, क्यों किया होगा यही सब में सोच रहा था। कुछ समय बैठने पर मैंने अब दिमाग शांत कर के एक एक मुर्ति को देखना शुरु किया। यहां त्रिमुर्ति को देखकर कुछ देर तो मैं वहीं ठहर गया ये मुर्ति जितनी बड़ी थी उतनी ही सुंदर। इसके अलावा अर्धनारीश्वर, नटराज, शिव-पार्वती, गंगाधर, कैलाश, बहुत बड़ा शिवलिंग और द्वारपाल जैसे और भी मुर्तियां थी जिसे देखकर बार बार मन में एक ही सवाल आ रहा था कि एक पहाड़ को काटकर किसी ने ये कैसे बनाया होगा? इसके अलावा टूटी हुई मुर्तियों को देखकर उतना ही बुरा भी लग रहा था कि क्यों इसे तोड़ा? एक गाइड से पूछा तो पता चला कि पुर्तगालियों ने यहां एक पत्थर का हाथी देखा था इसलिए इस जगह का नाम एलिफेंटा पड़ा। ये हाथी आज भी जीजामाता उद्यान में है। पुर्तगालियों के हमले के बाद ही ये जगह आम लोगों के नज़र में आयी और इसी के चलते कुछ मुर्तियां खंडित हो गयी।

गुफा नंबर एक से बाहर निकलने पर गुफा नंबर दो में गया जहां मूर्तियां तो नहीं हैं लेकिन पत्थर के पिलर आज भी अपनी दास्तां बयां करते हैं ऐसे ही गुफा नंबर तीन में एक बड़ा चबूतरा और खंडित शिवलिंग देखने को मिला। गुफा नंबर चार में शिवलिंग है जिसके बाहर दो द्वारपाल खंडित होकर आज भी खड़े हैं और यहां टपकता हुआ पानी भी दिखता है जो ये कह रहा हो मानो इतिहास आज भी कैसे सांस ले रहा है। गुफा नंबर पांच, छह और सात अब सिर्फ इतिहास में ही दर्ज है क्योंकि यहां कुछ नहीं बचा है और वहां लोगों के जाने की मनाही है।

यहां के बाद अंदर परिसर में ही खाने पीने के लिए कुछ मिल जाता है जो कि परिसर के बाहर से रेलिंग के उस पार से आपको खाने के लिए चाय-पानी मैगी जैसी चीज़े दे देते हैं। यहां के बाद बाहर जाने वक्त एक रास्ता उपर की ओर जाता है जहां अधिक्तर लोग नहीं जाते है लेकिन मेरा घुमक्कड़ मन कह रहा था चल दीपक ऊपर भी चलते हैं। और मैं चल पड़ा, रास्ता कच्चा था लेकिन दोनों तरफ हरियाली ने रास्ता थोड़ा आसान कर दिया और करीबन 30 मिनट के बाद मैं ऊपर पहुंचा। ये वो जगह थी जहां से पुर्तगालियों ने हमला किया था और हमें आज ये एलिफेंटा केव्स मिली। यहां कहने को तो सिर्फ दो तोप देखने को मिली लेकिन वहां से समुद्र और पोर्ट का जो नज़ारा दिखा वो देखकर मन एकदम खुश हो गया।

  • एलिफेंटा केव्स जाने के लिए ध्यान रखने के लिए बातें:
  • एलिफेंटा केव्स सोमवार को बंद रहते हैं।
  • आरामदायक जूते पहनें।
  • पानी, सनस्क्रीन और सनग्लास साथ रखें।
  • फेरी और टॉय ट्रेन दोनों तरफ की टिकट काउंटर से ले लें।
  • खरीदारी करते समय बर्गेनिंग करें।
  • कम से कम 3–4 घंटे का समय ज़रूर रखें।
  • शाम के वक्त जाते समय आखिरी फेरी का टाइम गेटवे ऑफ इंडिया पर नोट कर लें।

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